Saturday, April 30, 2022

खीरा खाने के fayde

खीरे को फल एवं शाक दोनों ही रूप में जाना जाता है। यह शरीर में खनिज लवण तथा विटामिंस की पूर्ति के लिए उत्तम आहार है। खीरा रोज उपयोगी फल के साथ-साथ आहार में एवं सलाद के रूप में सेवन किया जाता है। यह स्वाद के साथ-साथ अनेकों गुणसे परिपूर्ण है।

खीरे में आद्रता ,प्रोटीन, वसा ,कार्बोहाइड्रेड, खनिज द्रव्य, कैल्शियम , फास्फोरस, लौह तत्व, विटामिन होता है उसके बीजों में प्रोटीन ,वसा होता है इससे एक हल्का पीत वर्ण निकलता है। खीरा खाने के तुरंत बाद पानी न पीने की सलाह दी जाती है जिसे ph लेवल संतुलित रहता है और पाचन क्रिया सही रहती है।

बाल (कोमल) खीरा विशेष रूप से गुणकारी होता है इसके गुणों के कारण इसे बालम खीरा नाम से भी पुकारा जाता है।

खीरे के गुण 

१. कब्ज से राहत - पेट की जलन को कम करता है। पानी की कमी को पूरा करने व कब्ज की समस्या में राहत दिलाने में खीरा विशेष रूप से उपयोगी है।यह शरीर से विसैले तत्वों को निकाल कर आंतों की सफाई करता है।

२. आंतरिक और बाहरी सफाई - खीरा में पर्याप्त मात्रा में जल और फाइबर पाया जाता है जो आंतरिक रूप से शरीर की सफाई करता है। चहरे की झाइयां और सनबर्न को भी ठीक करता है ।खीरे के स्लाइस आंखों में रखने से आंखों का कालापन दूर होता है।

३. वजन को नियंत्रित - वजन कम करने की इच्छा रखने वालों को अपने आहार में रोजाना खीरे को शामिल करना चाहिए। इसमें कैलोरी की मात्रा कम होती है और पेट भी भरा लगता है।

४. कैंसर की रोकथाम- खीरा का नियमित सेवन करने वालों को कैंसर होने का खतरा कम रहता है। इसमें पाए जाने वाले तत्व कैंसर की रोकथाम में सहायक होते हैं।

५ . मधुमेह में उपयोगी - मधुमेह के रोगियों को अल्पाहार के रूप में ये अच्छा विकल्प है।हल्के भोजन के रूप में रोगियों को खीरा खाने की सलाह दी जाती है।

६ . मुत्रवह संस्थान के विकारों-को दूर करने में खीरा विशेष रूप से उपयोगी है।मूत्रावरोध,मूत्र स्थान की पथरी जैसे विकारों को दूर करता है।

खीरा रक्त की कमी, पीलिया, हाई ब्लड प्रेशर, यकृत विकार, नेत्रों की जलन,आदि अनेक रोगों में औषधि का काम करता है।अनेक पौष्टिक तत्वों से भरपूर खीरे को अपने भोजन में अवश्य स्थान दे।ये शारीरिक सौंदर्य को बढ़ाता है। अनेक बीमारियों को दूर कर शरीर को स्वस्थ रखता है। 

                                   By Rachna Mishra 

Tuesday, April 26, 2022

गुणकारी शहद fayde in Hindi

शहद आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति का महत्वपूर्ण तत्व है, इसके बिना आयुर्वेदिक औषधि उपचार अधूरा माना जाता हैं। प्रकृति में जो विविध पुष्प रस भरे पड़े हैं, मधुमक्खी इन्ही पुष्पों के से शहद तैयार करती है। कई प्रकार की मधुमक्खियां होती लेकिन अपनी देसी मक्खी का शहद ही गुणकारी और स्वादिष्ट होता है।

शुद्ध शहद की पहचान

शहद आदि काल से ही मधुर द्रव्य का प्रतिनिधि कर रहा है । इसके प्रयोग से ही इसकी उपयोगिता एवं औषधीय गुणों की जानकारी होती है। शहद में कई तत्व विद्यमान है, इसमें ग्लूकोस प्रक्टोज पर्याप्त मात्रा में होता है। शुद्ध शहद पानी में अपने आप नहीं घुलता, जबकि चीनी थोड़ी ही देर में स्वतः हो घुल जाती है, यह शहद की  सामान्य पहचान है । जो शायद जितना गाढ़ा होगा, उसमें नमी की जितनी कमी होगी शुद्धता की दृष्टि से उतना ही अच्छा माना जाता है । शहद ठंड में जम जाता है और गर्मियों से स्वता ही पिघलने लगता है।

शहद के औषधीय गुण

१. शहद की अपनी तासीर गर्म होती है खासकर जिस समय इसे छत्ते से निकालते हैं उस समय इसका प्रभाव अधिक होता है, धीरे-धीरे इसका प्रभाव सामान्य हो जाता है ।

२. शहद का विशेष गुण यह भी है कि गर्म पानी में लेने से गर्म तथा शीतल पानी में मिलाकर उपयोग करने से ठंडा होता है। प्रातः और सायं गर्म पानी में मिलाकर शहद पीने से शरीर की चर्बी कम होती है।

 ३. आंखों में एक bood प्रतिदिन डालने से आंख की ज्योति बढ़ती है।

 ४. इसके सेवन से रोग प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि होती है। गर्मियों में शहद की शिकंजी जिसमें एक बड़े गिलास में दो चम्मच शहद और एक दो बूंद नींबू का रस मिलाकर पीने से शरीर को तत्काल ऊर्जा मिलती है। और इससे पेशाब भी खुलकर होता है। 

५. अदरक तुलसी के रस को चम्मच में गर्म कर उसमें शहद मिलाकर उपयोग करने पर यह योग खांसी जुखाम में रामबाण प्रमाणित होता है।

 ६.केवल शहद खाने से भी फायदा होता है शहद को खाते ही तत्काल घुलकर शरीर में सीधे ऊर्जा देता है। जितना जल्दी शहद पचता है, उतना जल्दी अन्य कोई पदार्थ नहीं पचता।

८.फोड़े फुंसियों पर एंटीसेप्टिक निरोधक का काम करता है । चेचक के दाग शहद और नीबू के रस से हलके किए जा सकते हैं । इन्हें मिलाकर लगाया जाता है जिससे चेहरे की कांति लौट आती है। 

९. शहद का नित्य सेवन करने से दिल और दिमाग को शक्ति देता है, तथा दीर्घ जीवन प्रदान करता है ।

शायद को एक अर्थ में अमृत कहा जाता है। ज्यादा पुराना शहद अपना स्वाद, रंग और गुण खो देता है। इसलिए ताजे शहद का प्रयोग ही अधिक करना चाहिए।शहद का सेवन विशेषकर बच्चों और बूढ़ों को अधिक करना चाहिए।



Sunday, April 24, 2022

गर्मियों में अंगूर खाने के फायदे

अंगूर सभी फलों में स्वादिष्ट एवं उत्तम फल है। पकने पर सु मधुर और गुणकारी हो जाता है ।आयुर्वेद में अंगूर को सेहत का खजाना बताया गया है।भारत ही नहीं दुनिया के अनेक देशों में अंगूर रोगों को दूर करने का माध्यम माना गया हैं।अंगूर खाने से शरीर स्वस्थ सुंदर ,सुडौल बनता है और मानसिक अवसाद भी दूर होता है।

अंगूर के गुण -

शरीर को ऊर्जा प्रदान :-

इसमें सर्वोत्तम प्रकार का ग्लूकोज एवम प्रक्तोज होता है,जिससे रस पेट में पहुंचते ही शीघ्रता से सुपाच्य हो शरीर में ऊर्जा तथा ताप प्रदान करके शक्ति की वृद्धि करता है।

आंखों के लिए उपयोगी :-

अंगूर बलवर्धक, आंखों के लिए हितकारी और वातपित्त की वृद्धि को दूर करता है तथा खून भी बढ़ाता है ।सभी तरह के ज्वर में लाभकारी है।
 

खून की पूर्ति :-

 अंगूर में शर्करा 25% होती है। लोहा पर्याप्त मात्रा में होता है, जो खून में हिमोग्लोबिन बढ़ाता है ।खून की कमी वाले रोगों के लिए यह वरदान स्वरुप है ।

पेट सफाई :-

यह प्रबल कीटाणुनाशक है । इससे आंत तथा लीवर और किडनी अच्छी तरह काम करते हैं ।कब्ज दूर होता है ।मूत्र मार्ग की बाधाएं दूर होती हैं।

शक्ति वर्धक :-

अंगूर में पर्याप्त मात्रा में  विटामिन ए और सी है। बच्चे बूढ़े और दुर्बल लोगों के लिए बल देने वाला अनुपम आहार है। अंगूर खाने से ताकत आती है।यह हर प्रकार की कमजोरी को दूर करके शरीर को सुंदर और स्वस्थ बनाता है।

मिनरल्स की पूर्ति :-

इसमें पोटेशियम बहुत होता है जो किडनी के रोग ,हाय ब्लड प्रेशर ,तथा चर्म रोग में लाभकारी होता है। अंगूर मैग्नीशियम का भी अच्छा स्रोत है।

अनेक रोगों की दवा :-

अंगूर रोगियों के लिए उत्तम है, कैंसर ,टीबी, गैस्ट्रिक के घाव ,बच्चों का सूखा रोग, अपेंडिसाइटिस ,जोड़ों का दर्द गठिया तथा हृदय रोगियों के लिए शक्ति दायक फल है

रक्त शुद्ध :-

 अंगूर प्रबल छारिय आहार है, शरीर में खून बढ़ाता है और इसे साफ करता है। शरीर के विषैले पदार्थों को बाहर निकालता है ।

ज्वर नाशक :-

टाइफाइड बुखार हो या कोई वायरस जन्य बुखार सभी में अंगूर शरीर में नई शक्ति देने के लिए प्रयोग किया जाता है।

 कई लाइलाज बीमारियों में अंगूर रस कल्पामृत के समान काम करता है। लंबी बीमारी के बाद शरीर में आई कमजोरी को दूर करने में यह रामबाण दवा है कई आंतों के कैंसर रोगी अंगूर कल्प से स्वस्थ हुए हैं ।

अंगूर खट्टा होता है, उसे नहीं खाना चाहिए जब भी अंगूर खाए मीठे पके अंगूर ही खाए । खाने के पहले अंगूर को भलीभांति पानी से धो लें , क्योंकि अंगूर की खेती करने वाले इसमें कीटाणुनाशक दवाई का छिड़काव करते हैं तथा उन पर मच्छर और मक्खियां भी बैठती हैं।
 पके अंगूर सुखाने से किसमिस बनते हैं। जो कई आयुर्वेदिक दवाई  में प्रयोग होता है।
 अंगूर का रस छोटे बच्चों को 50 सी.सी. से अधिक नही देना चाहिए अधिक देने से दस्त आने लगते हैं वयस्क १००सी. सी.से 200 तक ले सकते हैं। शरीर में शक्ति संचार के लिए अंगूर का रस अदित्वीय है।

Thursday, April 21, 2022

आंवला के फायदे

 By Rachna Mishra 🌿

आंवला सर्वश्रेष्ठ शक्ति दायक फल है। इसका दूसरा नाम अमृत फल है। सचमुच ही इसमें अमृत के गुण है। यह विटामिन सी का अनंत भंडार है। एक पुष्ट आवले में 20 नरंगिओं के बराबर विटामिन सी रहता है, इस प्रकार यह शरीर को स्वस्थ बनाने के साथ-साथ सुंदर भी बनाता है। 

 आवले के गुण -

१. रक्त शुद्ध होता है और शरीर में रोग प्रतिरोधक शक्ति बढ़ती है।

२. आंवले की विशेषता यह है कि इसमें विटामिन गरम करने या सुखाने से भी नष्ट नहीं होते। 

३. त्रिफला चूर्ण का मुख्य घटक आंवला ही है।

४.चवनप्राश आवले से ही बनता है।भुजबल युवा अवस्था को isthir रखने बुढ़ापा दूर करने की ये सर्वश्रेष्ठ औषधि है। एक कथा है -

 महर्षि च्यवन ने बुढ़ापा दूर भगाने के लिए अश्विनी कुमार से उपाय पूछा था। उन्होंने चवन ऋषि को नित्य इस फल के सेवन करने के निर्देश दिए थे इसी के सेवन से चवन ऋषि का बुढ़ापा दूर हो गया था।

५. आंवला सर्व रोग नाशक दिव्य अमृत फल है यह दांतों मसूड़ों को मजबूत बनाता है ।

६.आंखों की ज्योति बढ़ाता है ।

७. शरीर में वीर्य की वृद्धि करता है। हाई ब्लड प्रेशर, ह्रदय रोग, कैंसर, नपुसंकता, मंदाग्नि ,स्नायु रोग, चर्म रोग लीवर और किडनी के रोग रक्त के रोग पीलिया, टीवी ,मूत्र रोग और हड्डी रोग दूर करने में इसका विशेष योगदान है।

८.आमला त्रिदोष नाशक है । इसमें लवड रस को छोड़कर बाकी पांचों रस भरे पड़े हैं। आधुनिक वैज्ञानिकों ने आंवला पर खोज की है और स्वीकार किया है कि अवला में पाए जाने वाला एंटी ऑक्सीडेंट एंजाइम बुढ़ापा को रोकता है। यह खोज तो हजारों वर्ष पहले भारत के प्राचीन ऋषि-मुनियों ने कर डाली थी ।

९.आंवला तेल सर के रोगों और बालों के लिए परम हितकारी है, इसे घर में बना लेना चाहिए बाजार में मिलने वाले अधिकांश आंवला तेल में कृतिम सेंट  रहते हैं। घर में बनाना चाहे तो तिल के तेल में ताजे आंवले का रस मिलाकर गर्म करें उसका पानी जल जाए तो उतार कर ठंडा करके और प्रयोग करें।

आंवले में जितने रोग प्रतिरोधक, रक्तशोधक और बल वीर्य वर्धक तत्व है वो संसार की किसीअन्य वस्तु या औषधि में नहीं। इसलिए स्वास्थ्य सुख चाहने वालों को अपने आहार में आंवले को प्रमुख स्थान देना चाहिए। लगभग 20 ग्राम चवनप्राश एक गिलास दूध के साथ नियमित सेवन करने सेआप इसके के चमत्कारी फल से परिचित हो जाएंगे ।ये पूर्णता प्रदान करने वाला सर्वश्रेष्ठ आहार है।

Tuesday, April 19, 2022

आम के औषधीय गुण in hindi

              By Rachna mishra                            

    आम एक सुपरिचित उपयोगी फल है, कच्चा आम अम्ल, वात ,पित्त्ववर्धक और पका आम मधुर, बलदायक सुखदायक,वातनाशक,शीतल ,कफऔर वीर्यवर्धक है। आम की मंजूरी (बौर) शीतल रुचिकारक ,वातकारक, अतिसार ,कफ पित्त और रुधिर नाशक है।

पाल  मे पकाकर भी आम खाया जाता है, परंतु इसमें जीवन शक्ति की न्यूनता होती है। आम का रस दूध के साथ पीने से शक्त्तिजनक और वीर्य वर्धक होता है। चूस कर प्रयोग किए जाने वाले आम को रसाल कहा जाता है। कलमी आम अत्यंत पित्तकारक होता है। आम के अति सेवन से मंदाग्नि, विषम ज्वर, रक्त दोष, नेत्र रोग उत्पन्न हो सकते हैं। अत्यधिक आम नहीं खाना चाहिए यह दोष कच्चे आम में देखे गए हैं। पके आम में विटामिन ए तथा सी अधिक मात्रा में होते हैं।

आम के अन्य उपयोग -

१. कच्चे आम को उबाल कर उसका रस निकाल कर उसमे भुना जीरा ,पुदीना और काला नमक डालकर पीने से लू नही लगती।कब्ज दूर होती हैं। पाचन क्रिया बढ़ती है। शुगर कंट्रोल होता है।पानी की कमी को पूरा करता है।

२. कच्चे आम की चटनी स्वादिष्ट होने के साथ रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाती हैं।नई कोशिकाओं का निर्माण करती है। पेट संबंधी समस्याओं से छुटकारा दिलाती है।

३. कच्चे आम का अचार विटामिन k ,faibar एंटिऑक्सीडेंट युक्त होता है।इसे सीमित मात्रा में लिया जाए तो ये खाने का स्वाद भी बढ़ाता है।

४. पके आम में विटामिन c और फाइबर होता है जो की कैलोस्ट्रल को नियंत्रित करता है।विटामिन a आंखों के लिए उपयोगी है । पाचन क्रिया ठीक रखता है और मोटापा कम करने में भी सहायक है।

५.आम की गुठली भी बहुत गुणकारी है।इसकी गुठली को सुखाकर पीस लें व चूर्ण के रूप में इसका प्रयोग करे इसे पेट में गैस की समस्या से छुटकारा मिलता है। गुठली को मिस्री के साथ पीस कर दो चमचे दिन में तीन बार लेने से दस्त में लाभ होता है।

Sunday, April 17, 2022

छांछ(butter milk)ke fayde in hindi

          By Rachna Mishra 

  आरोग्य रक्षा की दृष्टि से छांछ एक महत्वपूर्ण पेय पदार्थ है। यह स्वादिष्ट, सुपाच्य, शक्ति एवं स्फूर्ति बढ़ाने वाला अमृतुल्य पेय हैं। पेट के रोगों के लिए यह रामबाण औषधि है। जिस प्रकार स्वर्ग में देवताओं के लिए अमृत प्रधान है, उसी प्रकार पृथ्वी पर मनुष्य के लिए छाछ प्रधान है।

आयुर्वेद की दृष्टि से मट्ठे के भिन्न-भिन्न लक्षणों के आधार पर इसका वर्गीकरण किया गया है -

मथित - 

मलाई निकाल कर जो दही बिना जल मथा जाए उसे mathit  कहते हैं।

घोल -

 मलाई सहित बिना जल के मथे हुए दही को घोल कहते हैं।

Takra (मट्ठा)- 

जिस दही में चतुरंश जल डाल कर मथा जाए उसे takra कहते हैं।

घोल- वात और पित्त नाशक है, mathit कफ और पित्त नाशक है, मट्ठा अथवा छांछ त्रिदोष नाशक है।

गाय के छांछ में विशेष गुण होते हैं, जो इस प्रकार हैं :-

१. वात रोग में छाछ एवं सेंधा नमक मिलाकर सेवन करना हितकर है।

 २.कफ दोष में शॉर्ट पेपर मरीज और छार युक्त छांछ हितकर है।

३.हींग जीरा और सेंधा नमक मिलाया हुआ छांछ वात नाशक , अर्श और अतिसार दूर करने वाला है।

४.नमक मिलाकर छाछ का सेवन करने से ग्रहणी रोग(पाचन तंत्र संबंधी) दूर करने का कार्य करता है और बिना नमक का छांछ ग्रहणी औरअर्श (बवासीर)का विनाश करने वाला है।

५.वजन को नियंत्रित करता है। इसमें वसा की मात्रा कम हों जाती है जिसे ये वजन को कम करने में सहायक है।

६. छांछ में कैल्शियम की उपस्थिति हड्डियों को मजबूत बनाती है। 

७. पानी की कमी की पूर्ति करता है, पेट की जलन में राहत मिलती है । पेशाब की जलन में भी लाभदायक है।शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता । 

८. छांछ के सेवन से त्वचा में चमक आती है, चेहरे के दाग धब्बे मिटाने का भी काम करता है।आटा के साथ मिला कर लेप लगाने से झुर्रियां कम होती हैं।

९. बालों के लिए भी छांछ का प्रयोग बहुत अच्छा होता है, छांछ में नींबूका रस मिला कर लगाने से सिर की रूसी और खुजली में आराम मिलता है।हफ्ते में दो तीन दिन छांछ द्वारा बालों को धोने से बालों में मजबूती व चमक आती है।

कच्चा छांछ कोष्ठ कफ का नाश करता है,कंठ स्थित कफ को बढ़ाता है। गरम छांछ पीनस, स्वास रोग में लाभदायक है।

छांछ नेत्ररोगोंका नाशक,बलकारक,रक्त और मांशवर्धक, पेट के दोषों को दूर करने वाला स्वादिष्ट पेय पदार्थ है।








Tuesday, April 12, 2022

त्रिफला के उपयोग एवम फायदे

 आजकल मनुष्य प्रकृति से जितना दूर होता जा रहा है, उतना ही वह विभिन्न रोगों से घिरता जा रहा है। स्वास्थ्य तथा दीर्घायु तक जीने के लिए एक बहुत ही उपयोगी पदार्थ है, त्रिफला। यदि कोई व्यक्ति त्रिफला का नियमित रूप से सेवन करता है,तो वो सभी रोगों से मुक्त हो सकता है। त्रिफला रोगों की एक अमृत दवा है। इसका कोई साइड इफेक्ट नहीं।

त्रिफला में तीन पदार्थ है आंवला, बहेड़ा और पीली हरण। इन तीनों का सम्मिश्रण त्रिफला कहलाता है, यह तीनों पदार्थ सहज में ही मिल जाते हैं ,इन्हें प्राप्त कर घर पर ही त्रिफला का निर्माण किया जा सकता है।

त्रिफला के लिए इन तीनों पदार्थों के सम्मिश्रण का एक निश्चित अनुपात है पीली हरण का चूर्ण एक भाग बहेड़ी का चूर्ण 2 भाग आंवले का चूर्ण 3 भाग तीनों फलों की गुठली निकाल कर खरल आदि में कूट कर चूर्ण बना लें यह मिश्रण कांच की बोतल में भर कर कर रख दे ताकि बरसाती हवा इसमें ना पहुंच सके। 4 माह की अवधि बीत जाने पर इसे काम में नहीं लेना चाहिए ,क्योंकि है उतना उपयोगी नहीं रहता।

त्रिफला के सेवन विधि का भी हमें ज्ञान होना चाहिए। इसका 12 वर्ष नित्य, नियमित रूप से प्रातः बिना कुछ खाए ताजे पानी के साथ एक बार लेना चाहिए। उसके बाद 1 घंटे तक कुछ नहीं खाना पीना चाहिए। कितनी मात्रा में लिया जाए उसका भी एक विधान है- जितनी उम्र हो उतनी ही रत्ती लेनी चाहिए, परंतु एक बात ध्यान रहे त्रिफला के सेवन से एक या दो पतले दस्त होंगे किंतु घबराना नहीं चाहिए।

यदि त्रिफला प्रत्येक ऋतु में निर्णय वस्तुओं के साथ मिला कर लिया जाए तो इसकी उपयोगिता और भी बढ़ जाती है।

१.अगस्त और सितंबर में त्रिफला को सेधा नमक के साथ लेना चाहिए।

२.नवंबर में त्रिफला को शक्कर या चीनी के साथ त्रिफला के चूर्ण का छठा भाग कर लेना चाहिए।

३.दिसंबर और जनवरी में सोंठ के चूर्ण के साथ ।

४.फरवरी और मार्च में पीपल के चूर्ण के साथ सेवन करना चाहिए।

५.अप्रैल और मई में त्रिफला का सेवन शहद के साथ करना चाहिए।

६.जून और जुलाई में त्रिफला को गुड़ के साथ  चाहिए। प्रत्येक का छठा भाग।

इस क्रम और विधि से त्रिफला का सेवन करने से बहुत ही लाभ होता है। तन की सुस्ती दूर होती है। रोगों से मुक्ति मिलती है। नेत्र ज्योति बढ़ती है । शरीर सुंदर और बलशाली होता है।  बुद्धि का विकास होता है । बल अच्छे होते जाते हैं।  नेत्र ज्योति बढ़ती है। कंठ रोग दूर होते हैं ।वाक् सिद्धि प्राप्त होती है और तरुणाई आती है। इस प्रकार 12 वर्ष तक नियमित सेवन करना चाहिए।

Sunday, April 10, 2022

पुदीने के लाभ in hindi

पुदीने के लाभ 

By Rachna Mishra

 

पुदीना एक सुगंधित एवं उपयोगी औषधि है आयुर्वेद के अनुसार यह स्वादिष्ट रुचिकर पचने में आरक्षण तीखा, कड़वा, पाचन करता और उल्टी मिटाने वाला, हृदय को उत्तेजित करने वाला, कफ को बाहर ले जाने वाला, गर्भाशय संकोचक एवं चित्त  को प्रसन्न करने वाला जख्मों को भरने वाला, कृमि ज्वर ,विष ,अरुचि मंदाग्नि, अफरा, दस्त ,खांसी ,श्वास ,निम्न रक्तचाप  त्वचा के दोष, हैजा,अजीर्ण,सर्दी जुकाम आदि को मिटाने वाला है।

पुदीना में विटामिन ए प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। इसमें रोगप्रतिकारक शक्ति उत्पन्न करने की अद्भुत शक्ति है ।पाचक रसों को उत्पन्न करने की क्षमता है। पुदीना में अजवाइन के सभी गुण पाए जाते हैं।
पुदीना के बीज से निकलने वाला तेल स्थानिक एंथेस्टिक, पीड़ा नाशक एवं जंतु नाशक होता है। इसके तेल की सुगंध से मच्छर भाग जाते हैं।

विशेष -

पुदीना का ताजा रस लेने की मात्रा में 5 से 20 ग्राम इसके पत्तों के चूर्ण को लेने की मात्रा है 3 से 6 ग्राम काढ़ा लेने की मात्रा 10 से 40 ग्राम और अर्थ लेने की मात्रा 10 से 40 ग्राम तथा बीज का तेल लेने की मात्रा तीन बूंद है।
       

            औषधि के रूप में प्रयोग


(१) मलेरिया - 

पुदीना एवं तुलसी के पत्तों का काढ़ा बनाकर सुबह-शाम लेने से अथवा पुदीना एवं अदरक का रस एक एक चम्मच सुबह-शाम लेने से लाभ होता है।

(२) वायु एवं कृमि (कीड़े)- 

पुदीने के दो चम्मच रस में एक चुटकी काला नमक डालकर पीने से गैस तथा वायु एवं पेट के कीड़े नष्ट हो जाते हैं।

(३) पुराना सर्दी जुखाम एवं न्यूमोनिया - 

पुदीना के रस के 2-3 बूंदे नाक में डालने एवं पुदीना तथा अदरक के एक-एक चम्मच रस में शहद मिलाकर दिन में दो बार लेने से लाभ होता है।

(४) मासिक दोष - 

मासिक धर्म ना आने पर अथवा कम आने पर अथवा एवं कफ दोष के कारण बंद हो जाने पर पुदीने के कार्य में चुटकी भर हींग डालकर पीने से लाभ होता है शिव कमर की पीड़ा भी ठीक होती है।

(५) आंत का दर्द - 

अपच,अजीर्ण, अरुचि, मंदाग्नि आदि रोगों में पुदीने के रस में शहद डालकर ले अथवा पुदीने का अर्क ले।

(६) दाद - पुदीने 

के रस में नींबू लगाकर लगाने से दाद मिट जाता है। 

(७) उल्टी - दस्त ,हैजा - 

पुदीने के रस में नींबू का रस, अदरक का रस शहद मिलाकर पिलाने अथवा अर्थ देने से ठीक हो जाता है।

(८) हिस्टीरिया - 

रोज पुदीना का रस निकालकर उसे थोड़ा गर्म करके सुबह-शाम नियमित रूप से देने पर लाभ होता है।

(१०) मुख-दुर्गंध - 

पुदीने के रस में पानी मिलाकर अथवा पुदीना के काढ़े का घूट मुंह में भरकर रखें फिर उगल्दे इससे मुक्त दुर्गंध का नाश होता है।

Jeevandaayini फल,बेल ke fayde in Hindi

 by rachna Mishra

बिल्व वृक्ष प्रायः धार्मिक स्थानों विशेषकर भगवान शंकर की उपासना स्थलों पर लगाने की भारत में प्राचीन परंपरा है। बेल का महत्व धार्मिक दृष्टि से तो है ही। इसके स्वास्थ्य उपयोगी गुण भी हैं- 

१. पक्की बेल का गूदा, इमली और मिश्री भली प्रकार जल में मसलकर छानकर शरबत तैयार कर ले प्रातःमें इसके सेवन से शरीर की दाह (गर्मी) मूत्र का पीलापन मिचलाहट आदि दोष दूर होते हैं।

२. कैसा भी घाव हो बिल्व पत्र को जल में पका कर उस जल से धोने से धोने के बाद ताजे पत्ते पीसकर बांधे घाव को शीघ्र राहत मिलती है।

३. हृदय की घबराहट ,निद्रा एवं मानसिक तनाव पर इसकी छाल का प्रयोग बहुत ही लाभदायक है ।

४. श्वेत प्रदर और रक्त प्रदर में महिलाओं को इच्छा अनुसार गाय के दूध के साथ बेल के ताजे पत्तों को पीसकर थोड़ा जीरा मिलाकर दिन में 2 बार सेवन करने से लाभ मिलता है। 

५. नेत्रों का दुखना, लालिमा चढ़ाने में पत्तों को पीसकर पोटली बांधना हितकारी होता है। बच्चों के होने वाली पीली दस्त में एक चाय की चम्मच बिल्लो पत्र देने से लाभ मिलता है।

६. बेल का मुरब्बा अतिसार और खून मिले दस्तों पर प्रभावशाली क्रिया दिखलाता है।आंतों के घाव को भरने  में मुरब्बा बड़ा ही लाभकारी होता है।

७. बेल का रस दिल की जुड़ी बीमारियों से आराम दिलाता है और ब्लड शुगर को भी कंट्रोल करता है।

८. गैस ,अपच और कब्ज की समस्या में भी बेल का शरबत राहत देता है।


Saturday, April 9, 2022

High blood pressure लक्षण, कारण एवं निवारण

 By rachna mishra

आयुर्वेद चिकित्सा के अनुसार वात, कफ और पित्त का सम होना ही स्वस्थ शरीर का लक्षण बताया गया है। उच्च रक्तचाप को आयुर्वेद में शिरागत वात कहा जाता है। शिरा और कोशिकाओं की दीवारों पर रक्त के अधिक दबाव के कारण उच्च रक्तचाप होता है।

उच्च रक्तचाप के लक्षण - 

१. रोगी के सिर में विशेषकर सिर के पीछे के भाग में कम अथवा अधिक दर्द होना।

२. रोगी को सुबह शाम चक्कर आना।

३. हृदय गति अधिक हो जाना दर्द महसूस होना।

५. कार्य करने में मन नहीं लगना, स्वभाव चिड़चिड़ा हो ना थोड़ा सा कार्य करने पर थकान आ जाना।

५. निद्रा काम आना अथवा टूट- टूट कर आना।

६. भूख कम लगना खाने में अरुचि होना।

७. पेशाब की मात्रा कम होना, पेशाब में चूरिक एसिड बढ़ जाना।

८. मल आदि का अनियमित त्याग।

आयुर्वेद की दृष्टि से उच्च रक्तचाप के कारण -

१. इसका मूल कारण शरीर में वात की अधिकता है इससे धमनिया कठोर हो जाती हैं।

२. यह अनियमित दिनचर्या के कारण भी हो सकता है। जैसे समय पर ना उठना, समय पर मल त्याग ना करना, व्यायाम न करना ,शाकाहारी भोजन ना करना, समय पर विश्राम ना करना, अनावश्यक परिश्रम करना और समय पर ना सोना।

३. अधिक शोक, मानसिक चिंता ,क्रोध होने से भी रक्तचाप बढ़ जाता है।

उच्च रक्तचाप निवारण के उपाय -

१.धमनियों की कठोरता को दूर कर उन्हें पुनः संकुचन शीलता लाना, ह्रदय की गति एवं स्पंदन की ताल में एक बद्धत्ता लाना और यह केवल आयुर्वेद द्वारा ही संभव हो पाया है।

२. कर्म ,वचन एवं मानसिक रूप से ब्रह्मचर्य का पालन करें।

३. शारीरिक और मानसिक कार्य उतना ही करें जिससे अधिक श्रम ना पड़े।

४. प्रतिदिन यथासंभव घूमने जाए जहां प्रकाश एवं स्वच्छ हवा हो।

५. रोज तेल मालिश करके गुनगुने पानी से स्नान करें।

६. रात्रि में सूर्यास्त से पहले भोजन करें और निश्चित समय पर सोए।

७. मस्तिष्क को थकान ना आए ऐसा मानसिक कार्य करें, साहित्य पढ़े।

८.भोजन में नमक का प्रयोग कम करें।

९. नियमित व्यायाम करें। सुखासन, भुजंगासन बालासन, शवआसन अवश्य करें।

१०.फल ,सब्जियां अधिक खाए। वसा युक्त भोजन का प्रयोग कम करें। सात्विक आहार ले

११.बृहद वात चिंतामणि रस जो की स्वर्ण भस्म, रौप्य भस्म, लोहभस्म ,अभ्रक भस्म ,रस सिंदूर से बना होता है का सेवन उच्च रक्तचाप के लिए बहुत हितकर है।

१२. योगेंद्र रस, भ्रगराजसव रस ,धमासा जवाशा रस उच्च रक्तचाप को नियंत्रित करता है।

प्रत्येक औषधि को अनुभवी शिक्षित वैध के मार्गदर्शन से ही लेना चाहिए। औषधियों को सही समय व मात्रा में ही ले।


Friday, April 8, 2022

गेहूं के चोकर के फायदे in hindi

गेहूं का चोकर कब्ज दूर करने मैं महत्वपूर्ण औषधि है। कब्ज दूर करने के साथ-साथ इसका सेवन करने से निम्नलिखित लाभ भी प्राप्त होते हैं -

By Rachna Mishra 


१. यह माल को सूखने नहीं देता। यह मल को पतला तथा मुलायम बनाता है ।आंतों मरोड़ नहीं पैदा होती। मल बिना जोर लगाए आसानी से निकल जाता है।

२.यह देखने में खुरदुरा है परंतु खाते समय मुंह की लार से मुलायम हो जाता है ।यह मुंह की लार को काफी मात्रा में समेट लेता है जोभोजन के पचने में सहायता करता है।

३. चोकर युक्त आटे की रोटी स्वास्थ्य के लिए बहुत ही हितकर है ।इसे सब्जी, दूध ,दही ,सलाद शहद में मिलाकर भी खाया जा सकता है ।गुड़ में मिलाकर लड्डू बनाया जा सकता है।

४. यह कैंसर दूर रखता है तथा आंतों की सुरक्षा करता है, अमाशय के घाव को ठीक करता है। हृदय रोग से बचाता है, कैलोस्ट्राल से रक्षा करता है।चोकर से नहाने से चर्म रोग ठीक होता है।

५.मोटापा घटाने के लिए चोकर महत्वपूर्ण औषधि है। ये मधुमेह निवारण में भी काम आता है।

५.चोकर से बिस्किट,  हलवा, इडली, डोसा, कचौड़ी बना सकते है।सरसों के साग में भी चोकर का प्रयोग होता है।

६. छोटी मिल का सफाई से बना चोकर मोटा एवम अच्छा होता है।
 
७.चोकर खाने वालों का दिल दिमाग स्वस्थ रहता है, क्योंकि चोकर से पेट साफ हो जाता है। याद रखे कब्ज ही अधिकतर रोगों की जड़ है।

८.चोकर में प्रोटीन,वसा,कार्बोहाइड्रेट, कैलोरीज कैल्शियम, सोडियम, ऑक्जेलिक एसिड, पोटैशियम सल्फर क्लोरीन, जिंक, विटामिन ए, निकोटिन एसिड, फोलिक एसिड विटामिन के आदि पाया जाता है।

९. सभी प्रकार के अन्य रेशों (faibar) में गेहूं के चोकर को आदर्श स्थान मिला है , अर्थात गेहूं का चोकर आदर्श रेशा है।

१०. भोजन से गुणकारी चोकर को निकाल कर हम शरीर के साथ  अन्याय करते हैं।भोजन में चोकर को प्रधानता दे।

Wednesday, April 6, 2022

Swasth jivan ke liye dincharya in hindi

स्वस्थ जीवन के लिए दिनचर्या

By Rachna Mishra 

 संसार का कोई भी प्राणी ऐसा नहीं जो दुख चाहता हो सभी सुख चाहते हैं। यह तभी संभव है जब हमारा शरीर और मन पूर्णता स्वस्थ हो जिसके लिए आयुर्वेद में कुछ उपाय बताए गए हैं -

१.  प्रतिदिन सूर्योदय से पूर्व उठे, रात्रि में अधिक देर तक ना जागे।

२. प्रतिदिन नियमित रूप से व्यायाम करें।तैरने से अच्छा व्यायाम हो जाता है।सप्ताह में कम से कम एक बार पूरे शरीर में तेल मालिश करें।

३. सुबह शाम टहलना लाभदायक है। नियमित रूप से टहलने से संपूर्ण शरीर की मांसपेशियां सक्रिय हो जाती हैं। रक्त संचार बढ़ता है, शरीर में चुस्ती फुर्ती आती हैं,धमनियों में रक्त के थक्के नहीं बनते। हृदय रोग मधुमेह और ब्लड प्रेशर में लाभ पहुंचता है।

४. धूप, ताजी हवा, साफ स्वच्छ पानी और  सात्विक भोजन स्वस्थ रहने के लिए जरूरी है।

५. नित्य योगासन प्राणायाम करने से रोग नहीं होते और दीर्घायु की प्राप्ति होती है।

६. स्नान करते समय पहले सिर पर जल डालना चाहिए, उसके बाद अन्य अंगों पर ।जल ना तो अति ठंडा हो और ना बहुत गर्म ।स्नान के बाद किसी मोटे तालियों से अच्छी तरह रगड़ कर शरीर पोछना चाहिए।

७. स्वाद के लिए नहीं स्वस्थ रहने के लिए भोजन करना चाहिए।

८. पानी या दूध तेजी से ना पिए इन्हेंधीरे-धीरे पिए। पानी बैठकर एवं दूध खड़े होकर पीना चाहिए।

९. भोजन के बाद दिन में थोड़ा विश्राम तथा रात में टहलना अच्छा रहता है।

१०. चिंता से हानि होती है, लेकिन चिंतन से मन का बुद्धि विकास होता है।

११. रात में त्रिफला पानी में भिगो दें सुबह छानकर इससे आंखें धोएं और बचे हुए जल को पी जाय।

१२. मुख धोते समय ताजे ठंडे पानी के छींटे आंखों में डालने से आंखें स्वस्थ रहती हैं। हफ्ते 10 दिन के अंतर पर कानों में तेल की कुछ बूंदें डालें।

१३. बिस्तर के गद्दे तकिए चादर आदि को समय-समय पर धूप दिखाएं ।

१४. कपूर अथवा चंदन का धुआं घर में कुछ क्षणों के लिए अवश्य करें।

१५.नमक और सरसों का तेल मिलाकर दांत और मसूड़ों में रगड़े इससे दांत मजबूत होते हैं और पायरिया से भी मुक्ति मिल जाती है।

१६. सोने से पहले पैरों को धोकर पोछे, कोई अच्छी स्वास्थ्य संबंधी पुस्तक पढ़े, नींद आने पर ही बिस्तर में जाएं ,बिस्तर में पड़े पड़े नींद की राह देखना बीमारी को निमंत्रण देता हैं ।

१७. रात्रि का भोजन, सोने के 3 घंटे पहले करें। भोजन की एक घंटा बाद फल या दूध ले।

१८. सुबह-सुबह हरी दूब पर नंगे पैर टहलना काफी लाभप्रद है, पैर पर दूब के दबाव से तथा पृथ्वी के संपर्क से कई रोगों की चिकित्सा स्वता हो जाती है

१९. भोजन के प्रारंभ में और अंत में अधिक मात्रा में जल ना पिए बीच में दो-तीन घूंट पानी पी सकते हैं

२०. केला दूध दही और मट्ठा एक साथ नहीं खाना चाहिए कटहल के बाद दही और मट्ठा एक साथ नहीं खाना चाहिए

२०. दूध के साथ नमक खट्टा फल दही तेल मूली और तुरई का सेवन नहीं करना चाहिए दूध के साथ आंवला मिश्री चीनी परवल अदरक सेंधा नमक लिया जा सकता है

२१. भोजन करने के बाद लघुशंका आवश्यक करनी चाहिए इससे गुर्दे स्वस्थ रहते है।

Tuesday, April 5, 2022

भोजन विज्ञान से आरोग्य की प्राप्ति

भोजन से केवल उदर पूर्ति नहीं होती अपितु श्री भगवान की पूजा भी होती है, इसीलिए हमारे शास्त्रों  में भोजन की पवित्रता पर विशेष विचार किया गया है। हमारे प्राचीन ऋषि यों ने आहार संबंधी अनेक प्रकार के विचार प्रस्तुत किए हैं:-

१. स्थान विचार :-

भोजन का स्थान पवित्र, शांत और स्वच्छ होना चाहिए। यथासंभव भोजन बैठकर पूर्व दिशा की ओर मुख कर ही खाना चाहिए। पूर्व दिशा से प्राण स्वरूप सूर्य देव का उदय होता है, इस कारण पूर्व मुख भोजन करने से आयु बढ़ती है।

२. शारीरिक और मानसिक शुद्धत :- 

हमेशा स्नान के बाद ही भोजन करना चाहिए। स्नान के बाद रोम छिद्र खुलने से रक्त संचार पर्याप्त मात्रा में होता है जिससे भोजन उचित प्रकार से पच जाता है। शांत मन से भोजन को भगवान का प्रसाद समझकर ग्रहण करना चाहिए भोजन की निंदा नहीं करनी चाहिए। भोजन परोसने वाले के प्रति कृतज्ञता के भाव प्रकट करना चाहिए।

३. भोजन की पवित्रता :-

 जो भोजन आप कर रहे है वो पवित्र और सात्विक होना चाहिए। गलत तरीके से प्राप्त किया और परोसा गया भोजन स्वास्थ्य के लिए उचित नहीं होता। खाया हुआ अन्य तीन भागों में विभक्त होता है- स्थूल अंश मल बनता है मध्य अंश मास बनता है और सूक्ष्मअंश से मन की पुष्टि होती है। अन्न के सात्विक गुण मन में भी सात्विक गुण पैदा करते हैं।

४. दिशा विचार :- 

पश्चमी देशों मे खाद्य संबंधी विचार सिर्फ रासायनिक मात्रा के आधार पर व्यक्त किए गए हैं। कैल्शियम प्रोटींस विटामिंस आदि के आधार पर कौन सा भोज्य पदार्थ उचित अथवा अनुचित है का मत बना लिया गया है। हमारे शास्त्रों में शरीर के प्रकार
   ऋतु,दिशा के आधार पर भोजन करने का विधान है। ऋतुभेद से वात, पित्त और कफ की न्यूनताऔर अधिकता के आधार पर भोजन करना चाहिए 

५. स्पर्श शुद्धता :- 

प्रत्येक मनुष्य में एक ही प्रकार के विद्युत शक्ति रहती है जो मनुष्य की प्रकृति और चरित्र के वेग से प्रत्येक में विभिन्न हो जाती है। जिस प्रकार के लोगों के साथ रहा जाए लोगों का छुआ या दिया अन्न सेवन किया जाए उसी तरह की बुद्धि ग्रहण करने वाली की हो जाती है। अतः हर किसी का दिया अन्न ग्रहण नहीं करना चाहिए।

६. मात्रा विचार :- 

उदर का  2 भाग भोज्य पदार्थ से तीसरा भाग जल से और चौथा भाग वायु संचार के लिए खाली रखा जाए यही मिताहार के लक्षण है। इससे आयु बढ़ती है, रोग का नाश होता है तथा बल और सुख का लाभ होता है। सहजता से पचने वाला भोजन ही करना चाहिए।

७. मुख शुद्धि और आसन :- 

भोजन के बाद वेग के साथ कुल्ला करना चाहिए।कुछ देर वज्रासन में बैठना और उसके पश्चात सौ कदम घूम कर आने के बाद बाई करवट सोना चाहिए। नाभि के ऊपर वाम पार्श्व में अग्नि रहती है, इसलिए बाई करवट सोने पर भोजन का पाचन अच्छे से होता है। भोजन के बाद बैठे रहने से शरीर में भारीपन और इंद्रियों में शिथिलता आने लगती है, सोए रहने से शरीर पुष्ट होता है थोड़ी देर टहल के आने से आयु बढ़ती है और खाते ही दौड़ने से मृत्यु भी पीछे-पीछे जाती है। ये सब आहार के नियम है इनका पालन अवश्य करना चाहिए।        
                                 -Rachna mishra



Monday, April 4, 2022

स्वस्थ जीवन के सूत्र

 एकमात्र मनुष्य ही ऐसा प्राणी है जिसे विवेक और कर्म करने का सामर्थ्य प्राप्त है। पर यह सामर्थ भी पूरी तरह सफल तभी हो सकता है जब शरीर और मन दोनों पूर्ण स्वस्थ होते हैं।

स्वस्थ जीवन के कुछ मूलभूत सूत्र शास्त्र द्वारा वर्णित है जो निम्न प्रकार है -

१. आचार विचार:- आचार विचार परम धर्म है। सदाचार में लगे मनुष्य का शरीर स्वस्थ, मन शांत और बुद्धि निर्मल होती है एवं उसका अंतः करण शीघ्र शुद्ध हो जाता है।

२. प्रातः जागरण: - पूर्ण स्वस्थ रहने के लिए कल्याणकारी व्यक्ति को प्रातः काल सूर्योदय से पूर्व उठ जाना चाहिए। जो सूर्य उगने के समय सोता है, उसकी उम्र और शक्ति घटती है तथा वह नाना प्रकार की बीमारियों का शिकार होता है।

३.उष: पान:- रात में ताम्र पात्र में रख कर ढका हुआ जल अवश्य पीना चाहिए, इससे कप वायु एवं पित्त दोष नाश होता है तथा व्यक्ति बलशाली एवं दीर्घायु हो जाता है। दस्त साफ होता है। पेट के सभी विकार दूर होते हैं।

४. मल मूत्र त्याग: - मल मूत्र का त्याग करते समय सिर को कपड़े से ढक लेना चाहिए तथा ऊपर नीचे के ना तो कुछ और से सटाकर रखना चाहिए। इससे दांत बहुत मजबूत होते हैं और बहुत दिनों तक चलते हैं। दांतों की कोई बीमारी नहीं हो पाती। मल मूत्र त्याग करते समय मौन रहना चाहिए।

५. व्यायाम तथा वायु सेवन: - शरीर को स्वस्थ रखने के लिए कार्य करने में सामर्थ बनाए रखने के लिए, पाचन क्रिया तथा जठराग्नि को ठीक करने के लिए, शरीर को सुगठित और सुडौल बनाने की दृष्टि से, अपने आयु, बल ,देश और काल के अनुरूप नियमित रूप से योगासन तथा व्यायाम अवश्य करना चाहिए। सुबह और शाम को नित्य खुली ताजी और शुद्ध हवा में अपनी शक्ति के अनुसार थकान ना मालूम होने तक साधारण चाल से घूमना चाहिए।

६. तेल मालिश: - रोज सारे बदन में तेल लगाने पर बड़ा लाभ होता है। गले के नीचे तक सरसों का तथा मस्तक पर तिल आदि का तेल लगावे सिरका ठंडा रहना और पैर का गर्म रहना अच्छा है।

७. स्नान: - स्नान करते समय पहले मस्तक पर जल डालना चाहिए, उसके बाद पूरे शरीर में। भोजन के तुरंत बाद नहीं नहाना चाहिए।

८. भोजन: - जब भी भोजन करें तो पहले भगवान को निवेदन करके प्रसाद रूप से ही ग्रहण करें। पैरों को धोकर भली-भांति कुल्ला करके हाथ मुंह धो कर भोजन करना चाहिए। प्रसन्न मन से खूब चबा चबाकर भोजन करें आयुर्वेद के अनुसार एक ग्रास को लगभग 32 बार चबाना चाहिए इससे दांत मजबूत होते हैं और आंतों को भोजन पचाने में कम समय लगता है।

९. शयन:- रात में भोजन के तुरंत बाद सोना नहीं चाहिए। सोने के तो 3 घंटे पूर्व ही भोजन कर लेना चाहिए। भगवान का ध्यान कर बाई करवट सोना स्वास्थ्य के लिए उत्तम है।       

 -Rachna Mishra 

नवरात्रि विशेष-धार्मिक व्रतों से आरोग्यता

आज पाश्चात्य संस्कृति से प्रभावित समुदाय के मन में यह प्रश्न अवश्य उठता है कि धार्मिक व्रतों के पीछे कोई वैज्ञानिक आधार या सिद्धांत है या नहीं। अगर हम 200 वर्षों के इतिहास का सिंहावलोकन करें तो आज की तुलना में तत्कालीन भारतीय समाज अधिक स्वस्थ और निरोग था उसके पीछे बहुत बड़ा कारण धार्मिक व्रतों से आरोग्यता की प्राप्ति भी थी।
भारतवर्ष में नव वर्ष प्रारंभ से ही सभी तिथियों में व्रत का विधान है। सभी व्रत करने संभव तो नहीं तथापि प्रत्येक मास में कम से कम एक या दो व्रतों का पालन अवश्य करना चाहिए।

चैत्र शुक्ल प्रतिपदा इसी दिन से श्री राम नवमी चैत्र नवरात्र उत्सव का शुभारंभ होता है। अनेक स्त्री-पुरुष इस में उपवास रखकर भगवान श्री राम और भवानी माता की उपासना करके शांति और सुख प्राप्त करने की कामना करते हैं।
नवरात्रि व्रत के पालन से अनेक सामान्य रोगों से मानव मुक्ति प्राप्त करके स्वस्थ जीवन का अनुभव करते हैऔर मानसिक तनाव से छुटकारा पाकर भगवत प्राप्ति का सहज सुलभ साधन प्राप्त कर सकता है।
आरोग्य की दृष्टि से सप्ताह में कम से कम 1 दिन उपवास करके उस दिन से संबंधित देवी - देवता की आराधना  अर्चना करना पुण्य दायक है। सामान्यता दूध फल साबूदाना सिंघाड़ा मखाना आदि सात्विक सुपाच्य और हल्के पदार्थों का सेवन करना अत्यंत लाभकारी है ।संभव हो तो पूर्ण रूप से निराहार एवं निर्जल व्रत करना चाहिए ।अधिकांश व्रतों में दान करने की परंपरा भी है ।उपवास में नियम धर्म पालन करने वाले व्यक्तियों का स्वास्थ्य उत्तम रहेगा ही साथ ही उनके व्यक्तित्व का भी विकास होगा।
अतः धार्मिक व्रतों का उचित पालन करने से शारीरिक शुद्धि होकर आध्यात्मिक शांति भी प्राप्त होगी। इन व्रतों के माध्यम से हम ईश्वर की भी प्राप्त कर सकते हैं।

-Rachna Mishra

खीरा खाने के fayde

खीरे को फल एवं शाक दोनों ही रूप में जाना जाता है। यह शरीर में खनिज लवण तथा विटामिंस की पूर्ति के लिए उत्तम आहार है। खीरा रोज उपयोगी फल के सा...