भोजन से केवल उदर पूर्ति नहीं होती अपितु श्री भगवान की पूजा भी होती है, इसीलिए हमारे शास्त्रों में भोजन की पवित्रता पर विशेष विचार किया गया है। हमारे प्राचीन ऋषि यों ने आहार संबंधी अनेक प्रकार के विचार प्रस्तुत किए हैं:-
१. स्थान विचार :-
भोजन का स्थान पवित्र, शांत और स्वच्छ होना चाहिए। यथासंभव भोजन बैठकर पूर्व दिशा की ओर मुख कर ही खाना चाहिए। पूर्व दिशा से प्राण स्वरूप सूर्य देव का उदय होता है, इस कारण पूर्व मुख भोजन करने से आयु बढ़ती है।
२. शारीरिक और मानसिक शुद्धत :-
हमेशा स्नान के बाद ही भोजन करना चाहिए। स्नान के बाद रोम छिद्र खुलने से रक्त संचार पर्याप्त मात्रा में होता है जिससे भोजन उचित प्रकार से पच जाता है। शांत मन से भोजन को भगवान का प्रसाद समझकर ग्रहण करना चाहिए भोजन की निंदा नहीं करनी चाहिए। भोजन परोसने वाले के प्रति कृतज्ञता के भाव प्रकट करना चाहिए।
३. भोजन की पवित्रता :-
जो भोजन आप कर रहे है वो पवित्र और सात्विक होना चाहिए। गलत तरीके से प्राप्त किया और परोसा गया भोजन स्वास्थ्य के लिए उचित नहीं होता। खाया हुआ अन्य तीन भागों में विभक्त होता है- स्थूल अंश मल बनता है मध्य अंश मास बनता है और सूक्ष्मअंश से मन की पुष्टि होती है। अन्न के सात्विक गुण मन में भी सात्विक गुण पैदा करते हैं।
४. दिशा विचार :-
पश्चमी देशों मे खाद्य संबंधी विचार सिर्फ रासायनिक मात्रा के आधार पर व्यक्त किए गए हैं। कैल्शियम प्रोटींस विटामिंस आदि के आधार पर कौन सा भोज्य पदार्थ उचित अथवा अनुचित है का मत बना लिया गया है। हमारे शास्त्रों में शरीर के प्रकार
ऋतु,दिशा के आधार पर भोजन करने का विधान है। ऋतुभेद से वात, पित्त और कफ की न्यूनताऔर अधिकता के आधार पर भोजन करना चाहिए
५. स्पर्श शुद्धता :-
प्रत्येक मनुष्य में एक ही प्रकार के विद्युत शक्ति रहती है जो मनुष्य की प्रकृति और चरित्र के वेग से प्रत्येक में विभिन्न हो जाती है। जिस प्रकार के लोगों के साथ रहा जाए लोगों का छुआ या दिया अन्न सेवन किया जाए उसी तरह की बुद्धि ग्रहण करने वाली की हो जाती है। अतः हर किसी का दिया अन्न ग्रहण नहीं करना चाहिए।
६. मात्रा विचार :-
उदर का 2 भाग भोज्य पदार्थ से तीसरा भाग जल से और चौथा भाग वायु संचार के लिए खाली रखा जाए यही मिताहार के लक्षण है। इससे आयु बढ़ती है, रोग का नाश होता है तथा बल और सुख का लाभ होता है। सहजता से पचने वाला भोजन ही करना चाहिए।
७. मुख शुद्धि और आसन :-
भोजन के बाद वेग के साथ कुल्ला करना चाहिए।कुछ देर वज्रासन में बैठना और उसके पश्चात सौ कदम घूम कर आने के बाद बाई करवट सोना चाहिए। नाभि के ऊपर वाम पार्श्व में अग्नि रहती है, इसलिए बाई करवट सोने पर भोजन का पाचन अच्छे से होता है। भोजन के बाद बैठे रहने से शरीर में भारीपन और इंद्रियों में शिथिलता आने लगती है, सोए रहने से शरीर पुष्ट होता है थोड़ी देर टहल के आने से आयु बढ़ती है और खाते ही दौड़ने से मृत्यु भी पीछे-पीछे जाती है। ये सब आहार के नियम है इनका पालन अवश्य करना चाहिए।
-Rachna mishra
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